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‘देवी’ और ‘देह’ के द्वैत से परे : स्त्री का मनुष्यत्व-लेखक : डॉ. बृजेश कुमार साहू

भोपाल :भारत में नवरात्रि केवल नौ दिनों का धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, साधना, आत्मानुशासन और सांस्कृतिक चेतना का महत्त्वपूर्ण अवसर है। माँ दुर्गा के नौ स्वरूप-शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री-प्रकृति, ज्ञान, साहस, सृजन, संवेदना, स्वतंत्रता, भयमुक्ति, नैतिकता और मानवीय उत्कर्ष की प्रेरणा देते हैं। किंतु एक बुनियादी प्रश्न है कि जिस समाज में स्त्री को देवी के रूप में सर्वोच्च शक्ति का प्रतीक माना जाता है, वहाँ वास्तविक स्त्री की स्वतंत्रता, निर्णय-क्षमता और मानवीय गरिमा को कितनी सहजता से स्वीकार किया जाता है? यदि देवी की आराधना के साथ स्त्री की शिक्षा, स्वायत्तता और सार्वजनिक सहभागिता सीमित रहती है, तो उपासना का व्यापक नैतिक उद्देश्य अधूरा रह जाता है। किसी संस्कृति की वास्तविक परीक्षा उसके प्रतीकों की भव्यता से नहीं, बल्कि उनसे प्रेरित सामाजिक व्यवहार से होती है।

नवदुर्गा के नौ स्वरूपों को प्रकृति से ज्ञान, ज्ञान से साहस और आत्मबोध से न्यायपूर्ण मानवता तक की वैचारिक यात्रा के रूप में देखा जा सकता है। इसका दार्शनिक सूत्र है-ऋत से ऋजुता, ऋजुता से आत्मबोध और आत्मबोध से न्यायपूर्ण मानवता। वैदिक साहित्य में ‘ऋत’ सत्य, विश्व-व्यवस्था और व्यापक नैतिक क्रम से संबंधित अवधारणा है, जबकि ‘ऋजुता’ विचार, वचन और कर्म की संगति तथा सत्यनिष्ठा को दर्शाती है। यहाँ इन अवधारणाओं का प्रयोग समकालीन सामाजिक न्याय की दार्शनिक व्याख्या के रूप में किया गया है।

माँ शैलपुत्री : प्रकृति और स्वतंत्र गरिमा

माँ शैलपुत्री प्रकृति, स्थिरता और जीवन के मूलाधार का स्मरण कराती हैं। अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त का मंत्र-“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”-पृथ्वी के साथ हमारे संबंध को दर्शाता है। प्रकृति की तरह स्त्री भी समाज के अस्तित्व और विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन उसकी गरिमा को किसी प्राकृतिक या पारिवारिक भूमिका तक सीमित नहीं किया जा सकता। स्त्री माँ, वैज्ञानिक, शिक्षिका, प्रशासक, किसान, कलाकार या उद्यमी हो सकती है; उसकी पहचान केवल किसी एक भूमिका से निर्धारित नहीं होती। शैलपुत्री का समकालीन संदेश प्रकृति संरक्षण के साथ स्त्री की स्वतंत्र पहचान और मानवीय गरिमा को स्वीकार करना है।

माँ ब्रह्मचारिणी : ज्ञान, अनुशासन और विवेक

माँ ब्रह्मचारिणी तप, ज्ञान और संकल्प की प्रतीक हैं। ज्ञान का अर्थ केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि प्रश्न करना, प्रमाणों की जाँच करना और स्वतंत्र विवेक विकसित करना भी है। जब लड़कियों की शिक्षा को विवाह की तैयारी तक सीमित कर दिया जाता है या उनके विषय-चयन और करियर पर लैंगिक धारणाओं के आधार पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तब उनकी बौद्धिक स्वतंत्रता बाधित होती है। गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों की स्मृतियाँ भारतीय बौद्धिक परंपरा में स्त्रियों की दार्शनिक जिज्ञासा का परिचय देती हैं। ब्रह्मचारिणी का आधुनिक संदेश है कि स्त्री की साधना केवल दूसरों के लिए त्याग में नहीं, बल्कि ज्ञान अर्जित करने, अपना विवेक विकसित करने और जीवन के निर्णय स्वयं लेने में भी निहित है।

माँ चंद्रघंटा : साहस और अन्याय का प्रतिरोध

माँ चंद्रघंटा साहस, सजगता और अन्याय के प्रतिरोध की प्रेरणा देती हैं। स्त्री-सशक्तीकरण केवल आत्मविश्वास का प्रश्न नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक और संस्थागत व्यवस्था का भी विषय है, जिसमें वह हिंसा, भेदभाव और उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज उठा सके। घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और साइबर दुर्व्यवहार जैसी समस्याओं का समाधान केवल स्त्री को साहसी बनने की सलाह देकर नहीं हो सकता। इसके लिए प्रभावी कानून, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, संवेदनशील प्रशासन और न्याय तक आसान पहुँच आवश्यक है। संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 समानता तथा भेदभाव के निषेध के सिद्धांतों को स्थापित करते हैं। चंद्रघंटा का संदेश है कि शक्ति का उद्देश्य अन्याय का प्रतिरोध कर भयमुक्त वातावरण बनाना है।

माँ कूष्माण्डा और माँ स्कंदमाता : सृजन और संवेदना

माँ कूष्माण्डा सृजन और ऊर्जा की प्रतीक हैं। आधुनिक संदर्भ में सृजन केवल जैविक मातृत्व तक सीमित नहीं, बल्कि विज्ञान, साहित्य, कला, तकनीक और सामाजिक विकास में योगदान भी है। महिलाओं की प्रतिभा को परिवार और घरेलू दायित्वों तक सीमित करना उनकी बहुआयामी क्षमताओं की उपेक्षा है। उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आर्थिक संसाधनों और समान अवसरों तक पहुँच मिलनी चाहिए।

माँ स्कंदमाता मातृत्व, संवेदना और संरक्षण का स्मरण कराती हैं, लेकिन स्त्री की पहचान केवल मातृत्व नहीं है। बच्चों का पालन-पोषण, वृद्धों की देखभाल और घरेलू कार्य समाज के लिए आवश्यक हैं, फिर भी इनका बड़ा हिस्सा महिलाओं के अवैतनिक श्रम के रूप में सामने आता है। देखभाल को केवल स्त्री का दायित्व मानने के बजाय साझा पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करना आवश्यक है। इन दोनों स्वरूपों का संयुक्त संदेश है कि सृजन और संवेदना तभी सार्थक हैं, जब स्त्री को अपनी प्रतिभा विकसित करने और स्वतंत्र निर्णय लेने का अवसर मिले।

माँ कात्यायनी : स्वाभिमान और स्वतंत्रता

माँ कात्यायनी स्वाभिमान, स्वतंत्रता और अन्याय के प्रतिरोध की प्रेरणा देती हैं। स्त्री की स्वतंत्रता का अर्थ परिवार या समाज से संबंध-विच्छेद नहीं, बल्कि संबंधों को सम्मान, सहमति और समानता पर आधारित करना है। शिक्षा, विवाह, रोजगार, संपत्ति और सार्वजनिक जीवन से जुड़े निर्णयों में स्त्री की इच्छा और आवाज को महत्त्व मिलना चाहिए। परंपरा का सम्मान और उसकी आलोचनात्मक समीक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। जो परंपराएँ सहयोग और करुणा बढ़ाती हैं, वे समाज को समृद्ध करती हैं; लेकिन जो भेदभाव और अधिकारों के दमन को उचित ठहराती हैं, उनका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

माँ कालरात्रि : भयमुक्ति और सुरक्षा

माँ कालरात्रि भयमुक्ति का प्रतीकात्मक संदेश देती हैं। आज महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न केवल घर और सार्वजनिक स्थानों तक सीमित नहीं है; डिजिटल माध्यमों पर उत्पीड़न, निजी सूचनाओं का दुरुपयोग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित गैर-सहमति वाली अंतरंग छवियाँ भी गंभीर चुनौतियाँ हैं। इनके समाधान के लिए डिजिटल साक्षरता, गोपनीयता की रक्षा, प्रभावी शिकायत-व्यवस्था और संस्थागत जवाबदेही आवश्यक है। भयमुक्त समाज केवल व्यक्तिगत साहस से नहीं बनता, बल्कि ऐसी न्यायपूर्ण व्यवस्थाओं से बनता है, जहाँ हर व्यक्ति अपने अधिकारों का उपयोग अपमान, हिंसा या बहिष्कार के भय के बिना कर सके।

माँ महागौरी : नैतिकता और समानता

माँ महागौरी शुचिता और नैतिक परिष्कार की प्रेरणा देती हैं। यह विचारणीय है कि नैतिकता के मानदंड स्त्री और पुरुष पर समान रूप से लागू होते हैं या नहीं। जब स्त्री के वस्त्र, व्यवहार और व्यक्तिगत निर्णयों को कठोर कसौटियों पर परखा जाता है, जबकि पुरुषों के समान व्यवहार के प्रति उदारता दिखाई जाती है, तब नैतिकता सामाजिक नियंत्रण का माध्यम बन सकती है। ऋजुता हमें विचार, वचन और कर्म में संगति स्थापित करने की प्रेरणा देती है। स्त्री-सम्मान की घोषणा तभी सार्थक है, जब वह शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और स्वतंत्रता में भी दिखाई दे। स्त्री की गरिमा उसके रंग, पहनावे, वैवाहिक स्थिति या सामाजिक प्रतिष्ठा पर निर्भर नहीं हो सकती। नैतिकता की कसौटी प्रत्येक व्यक्ति का आचरण और सामाजिक संस्थाओं का व्यवहार होना चाहिए।

माँ सिद्धिदात्री : आत्मबोध और लोकमंगल

माँ सिद्धिदात्री सिद्धि, विवेक और आध्यात्मिक उत्कर्ष का प्रतीक हैं। व्यक्तिगत उपलब्धियों और सामाजिक शक्ति का उद्देश्य केवल प्रतिष्ठा या समृद्धि नहीं, बल्कि व्यापक मानवीय कल्याण होना चाहिए। यदि ज्ञान सामाजिक असमानता की उपेक्षा करे और तकनीकी विकास मानवीय गरिमा को कमजोर करे, तो उसे समग्र प्रगति नहीं कहा जा सकता। आत्मबोध का अर्थ अपनी क्षमताओं को पहचानने के साथ अपने पूर्वाग्रहों और उत्तरदायित्वों की समीक्षा करना भी है। स्त्री को अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप जीवन चुनने का अवसर मिलना चाहिए तथा पुरुषों और सामाजिक संस्थाओं को समानता एवं न्याय के प्रति अपने दायित्वों का बोध होना चाहिए। आत्मबोध जब सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ता है, तभी व्यक्तिगत उत्कर्ष लोकमंगल की दिशा में आगे बढ़ता है।

नवदुर्गा के नौ स्वरूपों का यह पुनर्पाठ भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्शों से सार्थक संवाद स्थापित करता है। संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 21 तथा अनुच्छेद 51A(e) समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करने की नागरिक जिम्मेदारी को रेखांकित करते हैं। इन आदर्शों की वास्तविक परिणति तभी संभव है, जब महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक अवसर, सुरक्षित वातावरण और निर्णय-प्रक्रियाओं में सार्थक भागीदारी मिले।

साथ ही, स्त्री से हमेशा त्यागमयी, सहनशील या असाधारण रूप से शक्तिशाली बने रहने की अपेक्षा करना भी उचित नहीं है। उसे थकने, सहायता माँगने, असहमति व्यक्त करने और अपना जीवन स्वयं चुनने का अधिकार है। देवी का प्रतीक प्रेरणा दे सकता है, लेकिन स्त्री के अधिकारों की वैधता किसी देवी-सदृश आदर्श के अनुरूप होने पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। स्त्री सम्मान की अधिकारी इसलिए है, क्योंकि वह एक स्वतंत्र मनुष्य है।

अंततः, नवरात्रि का व्यापक नैतिक संदेश केवल शक्ति की उपासना में नहीं, बल्कि उसके न्यायपूर्ण उपयोग में निहित है। शैलपुत्री प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व, ब्रह्मचारिणी ज्ञान-साधना, चंद्रघंटा न्यायपूर्ण साहस, कूष्माण्डा सृजन, स्कंदमाता संवेदना, कात्यायनी स्वतंत्रता, कालरात्रि भयमुक्ति, महागौरी नैतिक परिष्कार और सिद्धिदात्री विवेकपूर्ण उत्कर्ष की प्रेरणा देती हैं। इन सभी स्वरूपों को जोड़ने वाला विचार यही है कि श्रद्धा विवेक से, स्वतंत्रता उत्तरदायित्व से और व्यक्तिगत उत्कर्ष लोकमंगल से जुड़ना चाहिए।

ऋत से ऋजुता, ऋजुता से आत्मबोध और आत्मबोध से न्यायपूर्ण मानवता की यात्रा तभी सार्थक होगी, जब देवी की आराधना के साथ वास्तविक स्त्री के अधिकारों, स्वतंत्रता और गरिमा को भी समान रूप से स्वीकार किया जाएगा। यही नवरात्रि की सांस्कृतिक चेतना का समकालीन मानवीय विस्तार है।

समाचार सेवा-संतोष राज

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